घोटाले की कोख से जन्मा राजद…ऐसे बनती गई परिवार की पार्टी

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प्रमोद दत्त.
मूल जनता दल भ्रष्टाचार (बोफोर्स घोटाला) के खिलाफ हुई गोलबंदी से बना था। लेकिन इसके ठीक विपरीत चारा घोटाला उजागर होने के बाद अपनी सरकार बचाने,भ्रष्टाचार पर परदा डालने एवं घोटाले का विरोध करनेवालों का मुंह बंद करने के लिए लालू प्रसाद द्वारा राष्ट्रीय जनता दल(राजद) का गठन किया गया।
शुरूआत में जनता दल वीपी सिंह का जनता दल था जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ कर आए थे।1989 में केन्द्र में वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार भी बनी।1990 में बिहार में लालू प्रसाद के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी।लालू प्रसाद ने बिहार में जनता दल को अपनी जागीर समझते हुए अपनी मर्जी से चलाना शुरू किया।इस बीच जद में टूट होती रही।बिहार में 1994 में जार्ज-नीतीश के नेतृत्व में बड़ी टूट हुई।लेकिन तबतक मंडल और मंदिर विवाद होने से लालू प्रसाद सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द के चैम्पियन बन चुके थे। अहंकार में लालू ने पूरी पार्टी को चलाना शुरू किया और पार्टी पर पूरी तरह कब्जा कर लिया।
     चारा घोटाला में फंसने और चार्जशीटेड होने के बाद भी लालू प्रसाद जनता दल पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहते थे और इनसे खार खाए पार्टी के वरिष्ठ नेता लालू प्रसाद से मुक्ति चाहते थे। जब  जनता दल पर कब्जे को लेकर लालू प्रसाद की एक नहीं चली तब अहंकार और घोटाले की कोख से जन्मा राष्ट्रीय जनता दल।
जब चारा घोटाला में लालू प्रसाद की गिरफ्तारी लगभग तय हो गई तब लालू प्रसाद ने दल के किसी वरिष्ठ नेता पर भरोसा करने के बजाए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया।इस प्रकार सत्ता का हस्तानातंरण परिवार में कर परिवारवादी मानसिकता का परिचय दिया।हालांकि इससे पहले वे अपने दोनों साले साधु-सुभाष को सांसद-विधायक बना चुके थे।सरकार में दोनों की हनक भी खूब चलती थी।
लालू प्रसाद की जेल यात्रा के दौरान राबड़ी सरकार और राजद को बचाए रखने में जिन नेताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा वे सभी धीरे-धीरे किनारे किए जाते रहे और परिवार का दबदबा कायम होता गया। राबड़ी सरकार के संकटमोचन बने रघुवंश प्रसाद सिंह,जगतानंद सिंह,रंजन यादव,अब्दुल बारी सिद्दिकी,रामकृपाल यादव सरीखे नेताओं को बाद के दिनों में लालू के लालों से ही बेईज्जत होना पड़ा।
लालू प्रसाद के जेल प्रवास के दौरान उनकी अनुपस्थिति में ये सारे नेता राबड़ी-सरकार के सारथी बने रहे। सरकार के स्तर पर वरिष्ठ मंत्री जगतानंद सिंह का भरपूर सहयोग राबड़ी देवी को मिला।तब के केन्द्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह,प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल और लालू प्रसाद के बीच सेतु का काम करते रहे। इससे पहले जनता दल के अध्यक्ष पद की लड़ाई में भी रघुवंश प्रसाद सिंह चट्टान की तरह लालू प्रसाद के साथ खड़े रहे। लालू प्रसाद के जेल प्रवास के दौरान राजद के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में रंजन यादव वफादारी निभाते रहे।अब्दुल बारी सिद्दिकी व रामकृपाल यादव व्यक्तिगत स्तर पर राबड़ी देवी व उनकी सरकार का ढाल बने रहे।
लेकिन लालू प्रसाद के बेटे-बेटियों से इन नेताओं को बेइज्जत होना पड़ा।रघुवंश प्रसाद सिंह को तेजप्रताप ने चुभनेवाली बात कही जिससे वे आहत हुए। जगतानंद सिंह को जमीन पर बिठा कर खुद कुर्सी पर बैठे तेजस्वी यादव ने बिना बोले सबकुछ कह दिया। उन्हें उनकी औकात बता दी।रंजन यादव भी बेईज्जत होकर बाहर हुए और पाटलिपुत्र लोकसभा चुनाव में उनके खिलाफ मीसा भारती को उतार दिया गया। यही हाल रामकृपाल यादव का हुआ।प्रतिपक्ष के नेता रह चुके सिद्दिकी को दरकिनार कर तेजस्वी को पहले उपमुख्यमंत्री बनाना फिर सरकार गिरने पर तेजस्वी को ही नेता प्रतिपक्ष बना देने जैसी घटनाएं बताने लगी थी कि लालू प्रसाद का राजद अब कथित सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द वाला नहीं बल्कि एक परिवार की पार्टी बनती जा रही है।
अभी राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद,उनकी पत्नी राबड़ी देवी विधान परिषद सदस्य,बेटी मीसा भारती राज्यसभा सदस्य,छोटा बेटा तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री,बड़ा बेटा तेजप्रताप यादव मंत्री को मिलाकर कुनबा बना हुआ है। राजनीतिक गलियारे में चर्चा तेज है कि रेलवे में नौकरी के बदले जमीन घोटाले में अगर तेजस्वी यादव की गिरफ्तारी होती है तो उनकी पत्नी राजश्री को उपमुख्यमंत्री बनाकर परिवारवाद का विस्तार किया जा सकता है।

 

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