नेट मीडिया पर चुनाव आयोग की रही पैनी नजर

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आलोक नंदन,पटना.संचार क्रांति ने दुनिया की सूरत तब्दील कर दी है. राजनीति भी इससे अछूती नहीं है. माइक्रोब्लाग की छोटी-छोटी बातें टीवी चैनलों और राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बन जाती हैं. कम शब्दों में लिखे गये छोटे-छोटे वाक्य राजनीतिक भूचाल पैदा करने के लिए मुफीद है. ऐसे में जब बिहार में चुनाव का शोर जोरो पर हो और सोशल मीडिया और माइक्रोब्लाग का इस्तेमाल हथियार की तरह किया जा रहा हो, इस पर चुनाव आयोग की चौकस नजर होना स्वाभाविक है. आवारा, बदलचलन और अराजकता की हद से गुजर कर एक नये तरह की फ्रीडम फ्रैटरनिटी क्लब की वकालत करने वाली नेट मीडिया को आदर्श आचार संहिता के तहत पेश आने का पुख्ता इंतजामात कर लिया है. सवाल उठता है कि क्या नेट वर्ल्ड लोक आवाज नहीं है जहां पर हर कोई खुलकर अपनी बात रखता है, और फिर उस पर वैसे ही कंमेंट्स होते हैं. क्या माडेल कोड आफ कंटक्ट के दायरे में आम जनता आती है. क्या गली नुक्कड़ और चौराहों चौराहों पर चाय पान की दुकानों में राजनीतिक ठिठोली आचार संहिता के दायरे में आती है. सोशल मीडिया के अपने खतरे हैं,  चरमपंथी इस्लामी संगठन आईएस अपने लिए लड़ाकुओं का एक बड़ा नेटवर्क तैयार करने में कामयाब हो गया इससे सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है, लेकिन यह भी सच है कि सोशल मीडिया दुनियाभर में अभिव्यक्ति के एक मुखर माध्यम के रूप में भी कारगर भूमिका निभाई है.

पिछले एक दशक में नेट मीडिया के उभार और इसके राजनीतिक इस्तेमाल को देखते हुये चुनाव आयोग ने इन नेट मीडिया को पांच सिग्ममेंट में बांट रखा था.. सामूहिक प्रोजक्ट (कालेबोरेटिव प्रोजेक्ट) जैसे विकीपीडिया, ब्लाग और माइक्रोब्लाग जैसे ट्वीटर, सामग्री समुदाय (कंटेंट काम्युनिटी), सोशल नेटवरक्गि साइट जैसे फेसबुक और वर्चुअल गेम वर्ल्ड.

चुनाव आयोग को लगातार शिकायत मिलती रही है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल चुनाव के दौरान कई तरह की नकारात्मक और भ्रम फैलाने वाली गतिविधियों के खिलाफ किया जाता रहा है. इसलिए इसे कोड और कंटक्ट के दायरे में लेना जरूरी है. इस पर वे सारी नियमें लागू होती हैं जो प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर हैं. झूठ का प्रचार प्रसार इस पर नहीं होना चाहिए, किसी व्यक्ति विशेष या प्रतिनिधि के खिलाफ ऐसी कोई बात नहीं होनी चाहिए जो सीधे तौर पर उसे अपमानित करती हैं. समाज में नफरत फैलाने वाली बातें भी नहीं होनी चाहिए. नेटवर्ल्ड में ऐसा कोई करता है या फिर कोई इस संदर्भ में चुनाव आयोग को ठकठकता है तो फिर आयोग की मशनरी उसे अपने तरीके से हैंडल करेगी. इसे अपऱाध माना जाएगा. नामिनेशन के दौरान सभी प्रतिनिधियों को भी अपने फार्म में इमेल एकांउट सहित नेटवर्ल्ड की गतिविधियों में अपनी हलचल का ब्यौरा देना होगा.

पेड न्यूज वाले सारे प्रावधान भी नेटवर्ल्ड पर लागू बताया गया. बहुत सारे पेड कंटेट प्रोवाइडर बैठे हुये थे, प्रतिनिधियों के हक में हवा बनाने और दूसरों की बखियां उधेड़ने के लिए. सोशल मीडिया में इसकी तैयारी मुख्य रूप से दो तरह की थे, एक तरफ प्रतिनिधियों का पोजिटिव प्रोफाइल अपटूडेट करने की तो दूसरी तरफ सामने के उम्मीदवार को बिलो दि बेल्ट मारने की. यानि किक ऐसी जगह लगे की वह धराशायी होने की ओर बढ़ता रहे. कई सोशल समूह इसकी प्रैक्टिस लंबे समय से कर रहे थे. चुनाव आयोग के चुस्त दुरुस्त ऑफिसरों की टोली अपनी ओर से इन समूहों पर नेकल डाल पाएगी कह पाना थोड़ा कठिन है क्योंकि इनके सामने सबसे अहम चुनौती टुकड़ों में बंटी हुई इन टोलियों की पहचान करने की थी. नेट वर्ल्ड में दो धारी अंदाज में अपने एजेंडे को हासिल करने का इनका लक्ष्य तभी चुनाव आयोग की नजर आ पाता, जबतक कि कोई शिकायत नहीं करता और इन्हें एक साथ कई छद्म आई पर काम करने में महारत हासिल है, और सबसे बड़ी ये पहले से ही व्यस्थित तरकी से संगठित हैं और तमाम कायदों को दरकिनारा करते हुये कैसे इन्हें मकदस  हासिल करना पता है.

सोशल मीडिया पर पेड न्यूज को कंट्रोल करने का सवाल है तो कई लोगों ने पॉजिटिव फाइल में निखार लाने वाले कामों से अच्छी कमाई करते रहे हैं. लेन-देने के इस दायरे का अंदाजा चुनाव आयोग को नहीं हो सकता था क्योंकि यहां पर हार्ड कैश डिलिंग नहीं थी. सबकुछ साफ्ट है जो न तो दिखाई देता है और न ही सुनाई देता है. इस चोखी कमाई में कलाकार, कवि, साहित्यकार, पत्रकार, वकील, शिक्षक, प्रोफेसर से लेकर हर तरह के बुद्धिजीवी शामिल थे. सोशल मीडिया पर राजनीतिक वकालत करते हुये मोटी कमाई करने वाले वर्चुअल लोगों की पहचान करना पाना चुनाव आयोग के लिए एक टफ जाब तो था ही. और फिर मधुमखक्खियों के इस खोते में हाथ डालना चुनाव आयोग के लिए भी थोड़ा रिस्की हो गया था.

बिहार में अफसरों का ट्रांसफर करने के बाद चुनाव आयोग पहले से सोशल मीडिया के एक गुट के निशाने पर था. बिहार में चुनाव के पूर्व अफसरों के तबादले को लेकर चुनाव आयोग से सवाल किया जा रहा था कि क्या वह केंद्र के इशारे पर काम कर रहा है. इसके अलावा भी और कई तीर थे जो चुनाव आयोग के खिलाफ सोशल मीडिया पर चल सकते थे

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