लालू काल:दल पर कब्जे की होड़ और विवाद

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Lalu Prasad

प्रमोद दत्त.
पटना.जनता की अदालत को सबसे बड़ी अदालत कहने वाले लालू प्रसाद जनता दल पर कब्जे के प्रयास से लेकर राष्ट्रीय जनता दल के गठन तक लगातार कोर्ट की शरण में जाते रहे।पहली बार चुनाव आयोग के निर्देशानुसार पार्टी अध्यक्ष का चुनाव विधिवत प्रक्रिया से होना था।और लालू प्रसाद व शरद यादव के बीच जनता दल पर कब्जे की होड़ लगी थी।
इससे पहले 1991 में एसआर बोम्मई और जनवरी1996 में लालू प्रसाद हाथ उठाने की प्रक्रिया से अध्यक्ष बने थे।इसलिए प्रक्रिया के तहत 4 सितम्बर 96 को पीके सामंत को निर्वाची अधिकारी बनाया गया था।राज्यस्तरीय चुनाव होने के बाद 28 मई को जनता दल अध्यक्ष पद के लिए लालू प्रसाद व शरद यादव ने अपना- अपना पर्चा दाखिल किया था।
उम्मीदवार बन जाने के बाद लालू प्रसाद को जब लगा कि मौजूदा एलॉक्ट्रॉल सूची से वे चुनाव हार जाऐंगे तब अपने वर्तमान पद (अध्यक्ष) का इस्तेमाल करते हुए पांच प्रतिशत सदस्यों का मनोनयन कर लिया।और 8 जून को पटना में राष्ट्रीय परिषद की बैठक बुलाकर चुनाव की घोषणा कर दी। जबकि निर्वाची पदाधिकारी श्री सामंत ने सभी राज्य मुख्यालय में चुनाव कराने की घोषणा की थी।इस घोषणा पर लालू प्रसाद ने श्री सामंत को कारण बताओ नोटिस दे दिया।बस यहीं से दोतरफा याचिका दाखिल करने का सिलसिला शुरू हो गया था।
श्री सामंत की पहली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने यह कहकर लालू प्रसाद की दखल पर रोक लगा दी कि चुनाव घोषणा के बाद एवं स्वंय उम्मीदवार बन जाने के बाद वे इस अधिकार से वंचित हो जाते हैं।हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ लालू प्रसाद ने याचिका दाखिल की।उधर सहायक निर्वाचन पदाधिकारी बीके प्रसाद ने लालू प्रसाद द्वारा बुलाए राष्ट्रीय सम्मेलन पर रोक लगाने की मांग से संबंधित याचिका दाखिल कर दी।तब लालू-समर्थक सांसद एमएए फातिमी ने पूरी चुनाव प्रक्रिया को ही अवैध बताते हुए इस पर रोक की मांग से संबंधित याचिका दाखिल की।
जवाब में लालू-विरोधी सांसद दिनेश चंद्र यादव ने याचिका दाखिल की तो न्यायमूर्ति एसएम अग्रवाल ने विवाद को देखते हुए राष्ट्रीय सम्मेलन पर रोक लगा दी। पूर्व जज एनसी कोचर को पर्यवेक्षक बनाया तथा जद के चुनाव अधिकारियों के अधिकार में कटौती कर दी।जब लालू-समर्थक जयप्रकाश नारायण यादव और बैद्यनाथ पाण्डेय ने पुन: याचिका दायर की तब न्यायमूर्ति एसएन कपूर ने कार्यकारिणी बैठक बुलाने की इजाजत  तो दे दी लेकिन इसमें चुनावी चर्चा पर रोक लगा दी।
उधर,अधिकारों में कटौती पर श्री सामंत व बीके प्रसाद ने याचिका दायर की तो दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने सभी पदाधिकारियों की नियुक्ति के कागजात मांगे।इसके अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि सामंत राय क्या लालू प्रसाद व शरद यादव की नियुक्तियां तक गैरकानूनी हैं। यह दल में फर्जी कामकाज का सार्वजनिक उदघाटन था।
इसी खंडपीठ ने पर्यवेक्षक काम से एनसी कोचर को रोकते हुए मधु दंडवते व जयपाल रेड्डी को इसका भार सौंपा।रेड्डी इस काम से मुकर गए तब उनके स्थान पर केन्द्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह को दंडवते के साथ जोड़ दिया गया।जब रघुवंश प्रसाद सिंह ने लालू-हित में काम करना शुरू किया तब कोर्ट ने उन्हें भी हटाते हुए यह काम अकेले दंडवते पर सौंप दिया।इस हिदायत के साथ कि समय पर यानी 3 जुलाई तक चुनाव संपन्न करा लिए जाएं।अपने विपरीत बनी परिस्थिति को देखते हुए तब लालू प्रसाद मैदान से भाग खड़े हुए और 5 जुलाई 97 को विवादों के बीच राजद का गठन किया गया।

 

 

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