संवाददाता।पूर्णिया/मधेपुरा। ग्रामीण बिहार की फिजां में बदलाव की एक नई बयार बह रही है, और इस बदलाव का नेतृत्व कर रही हैं वहां की महिलाएं।
पूर्णिया और मधेपुरा के सुदूर ग्रामीण इलाकों से आई विशेष रिपोर्ट बताती है कि कैसे आधी आबादी ने सदियों पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए पशु व्यापार जैसे कठिन और पुरुष प्रधान क्षेत्र में अपनी धाक जमा ली है।
यह कहानी केवल व्यापार की नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान, तकनीक के समझदारीपूर्ण इस्तेमाल और आर्थिक आजादी की है, जो अब बिहार के इन जिलों में घर-घर की कहानी बनती जा रही है।
बकरी पालकों की तस्वीर बदली
लंबे समय तक, ग्रामीण इलाकों में बकरी पालन और छोटे पशुओं का व्यापार एक असंगठित और अपारदर्शी क्षेत्र बना रहा। महिलाएं साल भर पशुओं की देखभाल करती थीं, लेकिन जब उन्हें बेचने का समय आता था, तो बिचौलिये (दलाल) सक्रिय हो जाते थे।
जानकारी के अभाव और व्यवस्थित बाजार न होने के कारण, ये बिचौलिये पशुओं की कीमत मनमाने ढंग से तय करते थे, जिससे वास्तविक पशुपालक महिला को उनकी मेहनत का उचित फल कभी नहीं मिल पाता था।
वे अक्सर ठगी का शिकार होती थीं और औने-पौने दामों पर अपने कीमती पशुओं को बेचने पर मजबूर थीं।
आर्थिक बदलाव की बयार
लेकिन, अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। इस बदलाव की धुरी बना है ‘विलेज लाइव स्टॉक ट्रेड सेंटर’ मॉडल। द गोट ट्रस्ट के सहयोग से संचालित इन केंद्रों का प्राथमिक उद्देश्य पशु व्यापार को व्यवस्थित, वैज्ञानिक और किसानों के हित में बनाना है।
और सबसे क्रांतिकारी बात यह है कि इन केंद्रों के संचालन की पूरी जिम्मेदारी स्थानीय ग्रामीण महिला उद्यमियों और ‘पशुसखियों’ के कंधों पर है।
जगदीशपुर की सरिता, छर्रापट्टी की रिंकू देवी, चैनपुरा की अंजू कुमारी और ध्रुबिलाश गांव की अनेक पशुसखियां आज इस सामाजिक और आर्थिक बदलाव की मशाल थामे हुए हैं।

बकरी के लिए ऐप
वीएलटीसी केंद्रों पर तकनीक का इस्तेमाल इस पूरे व्यापार को पारदर्शी बनाता है। यहां पशुओं की कीमत महज अंदाजे से तय नहीं होती, बल्कि एक विशेष ‘प्राइसिंग ऐप’ (Pricing App) का उपयोग किया जाता है।
इस ऐप में पशु का ‘लाइव बॉडी वेट’ (जीवित वजन) और उसकी ग्रेडिंग (स्वास्थ्य और गुणवत्ता के आधार पर) दर्ज की जाती है।
इन वैज्ञानिक मापदंडों के आधार पर ऐप तुरंत पशु की सही और न्यायसंगत कीमत तय कर देता है। किसानों को एक औपचारिक मूल्य पर्ची (प्राइस स्लिप) दी जाती है, जिससे उन्हें अपने पशु की वास्तविक कीमत का स्पष्ट पता चल जाता है।
बिचौलियों की शामत
इस पारदर्शिता ने किसानों का भरोसा सिस्टम पर बहाल किया है। मूल्य पर्ची मिलने के बाद किसान पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं।
यदि वे चाहें, तो उस पर्ची को आधार बनाकर खुले बाजार में अधिक कीमत पर अपने पशु बेच सकते हैं, या फिर वे सीधे वीएलटीसी केंद्र को ही निर्धारित मूल्य पर बेच सकते हैं।
यह व्यवस्था बिचौलियों की भूमिका को पूरी तरह खत्म कर देती है, क्योंकि अब कीमत तय करने का अधिकार दलाल के हाथ में न होकर तकनीक और स्वयं पशुपालक के हाथ में है।
शोषक प्रणाली खत्म
व्यापार को और अधिक व्यवस्थित करने के लिए, पशुओं को क्लस्टर स्तर पर एकत्र किया जाता है। यहां केवल व्यापार ही नहीं होता, बल्कि पशुओं की वैज्ञानिक देखभाल भी की जाती है। उनके पोषण, साफ-सफाई और स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाता है, जिससे उनकी गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों बढ़ते हैं।
इसके बाद, ग्रेडिंग के आधार पर इन पशुओं को बड़े संस्थागत खरीदारों और थोक व्यापारियों को बेचा जाता है। इस सुव्यवस्थित प्रक्रिया ने बकरियों की कीमत तय करने की पारंपरिक और शोषक प्रणाली को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है।

आय में वृद्धि
इस पूरी कमान को संभालने में ‘दामगारा महिला बकरी पालक एफपीसी’ (किसान उत्पादक संस्था) ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह संगठन एक मजबूत नेटवर्क के रूप में काम करता है, जिससे वर्तमान में 1500 से अधिक पंजीकृत महिला किसान जुड़ी हुई हैं।
यह एफपीसी अपने सदस्य किसानों को न केवल विपणन (आउटपुट) में सहायता करती है, बल्कि उन्नत नस्ल के पशु, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सेवाएं (इनपुट) भी उपलब्ध कराती है, जिससे उनकी आय में निरंतर और स्थायी वृद्धि सुनिश्चित हो रही है।
क्या कहती हैं महिलाएं
पार्वती याद करती हैं कि कैसे पहले वह अपनी बकरियों को बहुत कम दाम पर बेचने को मजबूर थीं और हमेशा आर्थिक तंगी का सामना करती थीं।
लेकिन, वीएलटीसी मॉडल से जुड़ने के बाद, उन्हें अपने पशुओं का सही मूल्य मिलने लगा।
आज वह न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ भी बन चुकी हैं। पार्वती जैसी हजारों महिलाएं अब अपनी किस्मत खुद लिख रही हैं।
पशुपालन विशेषज्ञ प्रोफेसर संजीव कुमार इस पहल के महत्व को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि लंबे समय तक बकरी पालन क्षेत्र में महिलाओं को जानकारी की कमी और बाजार तक सीधी पहुंच न होने के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा।
बिचौलिये इसी लाचारी का फायदा उठाते थे। लेकिन वीएलटीसी जैसे मॉडल ने तकनीक और संगठन की शक्ति से इस पूरी स्थिति को पलट दिया है।
यह मॉडल न केवल महिलाओं को उनका आर्थिक हक दिला रहा है, बल्कि उन्हें एक व्यवसायी के रूप में सामाजिक पहचान भी दे रहा है।















