भ्रष्टाचार के पर्याय लालू,फिर भी मिलते हैं वोट…जाने क्या है राज ?

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जे.एन.ठाकुर

उस दौर में मीडिया और लोगों के बीच धारणा बनी थी कि लालू यादव भ्रष्ट हैं और 1990-2005 के बीच बिहार में उनकी वजह से पूरे राज्य में कानून व्यवस्था चरमरा गई थी।बिहार अराजकता का पर्याय बन चुका था और लालू के शासनकाल को जंगलराज कहा जाने लगा। 2005 में आई अजय देवगन की फिल्म अपहरण राज्य के तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों को समझने के लिए सटीक उदाहरण माना जाने लगा था।

और फिर नीतीश कुमार आएं। नवंबर 2005 में वो राज्य के मुख्यमंत्री बने। भाजपा के साथ गठबंधन वाली सरकार में नीतीश कुमार ने बिहार की अराजकता वाली छवि को बदलने में काफी हद तक सफलता भी हासिल की। मेनस्ट्रीम मीडिया में इस तरह की खबरें भी शुरू हुई कि नीतीश ने वो सब ठीक कर दिया है जो लालू और उनकी पार्टी ने बिगाड़ा था।

और फिर आया 2015 का बिहार चुनाव। नीतीश कुमार और लालू यादव काँग्रेस के साथ गठबंधन कर भाजपा को रोकने के लिए एकसाथ खड़े थे। वो कामयाब भी हुए। लेकिन इसमें जो गौर करने वाली बात थी वो यह कि लालू यादव की पार्टी RJD को 80 सीट्स मिले और नीतीश कुमार के JD(U) को 71. RJD का वोट शेयर 18.4% रहा जबकि JD(U)का 16.8%. दोनों ही पार्टी के सदस्यों ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था।

इन नतीजों के बाद कुछ जरूर सवाल उठाए गए। वो नेता जो ₹950 करोड़ के घोटाले में कन्विक्ट हो चुका है वो लोगों के बीच इतना पॉप्युलर क्यों है? क्या ये सिर्फ अच्छी मार्केटिंग का नतीजा हो सकता है या बिहार में 1990-2005 के बीच कुछ ऐसी चीज़ें भी हुईं जिसने लालू को बिहार का सबसे लोकप्रिय नेता बना दिया?

अगर किसी को लालू यादव की राजनीति की सफलता को समझना हो तो डेवलपमेंट जैसे शब्दों के रटे रटाये परिभाषाओं से बाहर निकलना होगा। लालू का शासन स्कूल, हॉस्पिटल, सड़क, बिजली मुहैया करवाने या इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के लिए कभी था ही नहीं। लालू सरकार का फोकस सिर्फ 3 तरफ रहा। बिहार के सामंती समाज में जातिवाद की जड़ों को हिलाना। पिछड़ी जाति के लोगों को सामाजिक न्याय देना। 1990 के दशक के दौरान राममंदिर के नाम पर हो रही हिंसा से  मुस्लिम समुदाय को बचाना।

लालू प्रसाद यादव की एक बात काफी मशहूर हुई, वो अकसर कहा करते थे, “भले ही मैं समाज के कमज़ोर तबके को स्वर्ग ना दे पाऊं लेकिन स्वर तो ज़रूर दूंगा।” और अगर पत्रकारों और शिक्षाविदों की मानें तो लालू ने किया भी यही। शिक्षाविद जेफरी विटसो की मानें तो लालू की राजनीति, राज्य की संस्थाएं जैसे कि पुलिस और प्रशासन को जानबूझकर कमज़ोर करने तथा पिछड़ी जाति के नेताओं के हाथ में सत्ता देने की थी। ऐसा करने का मकसद साफ था कि बदले में वो नेता अपने क्षेत्र के पिछड़ी जाति के लोगों की मदद कर सके।

विट्सो 2002 से एक डेटा बताते हैं: पूरे बिहार कैडर में कुल 224 IAS अफसर में से अगड़ी जाति के 133 IAS अफसर थे जिसमें ज़्यादातर भूमिहार,  ब्राह्मण, कायस्थ और राजपूत थे। जबकि कुर्मी, कोयरी और यादव जो की 3 सबसे बड़े OBC समुदाय हैं उन्हें मिलाकर सिर्फ 7 थे।

लेकिन अगर विधानसभा में पिछड़ी जाति के प्रतिनिधित्व की बात करें तो तस्वीर बिल्कुल अलग थी। 234 विधायकों में से सिर्फ 54 उन 4 ऊंची जाति के थे और 100 तीन सबसे बड़े OBC समुदायों में से थे।

इंडिया टुडे के 1995 की एक रिपोर्ट में  बिहार के सीतामढ़ी ज़िले में 45 साल का एक भूमिहीन मज़दूर बताता है कि कैसे अब ज़मींदार के सामने उसे नतमस्तक नहीं होना पड़ता और अपना सर ज़मीन में नहीं लगाना पड़ता। उसने कहा “मैं  अब अपने ज़मींदार को देखकर यह नहीं करता क्योंकि लालू ने ऐसा कहा।” इतिहासकार ज्ञान प्रकाश Al Jazeera में अपने एक लेख में लिखते हैं “मुख्यमंत्री के तौर पर वो डंके की चोट पर दलितों के पास गए। उन्होंने अपने बंगले का दरवाज़ा गरीब और पिछड़ी जाति के लोगों  के लिए खोल दिया। ऊंची जाति के लोगों के लिए यह ऑफिस का अपमान था लेकिन लालू घर-घर में अब चर्चा का विषय थे।”स्क्रोल में सबा नकवी अपने लेख में लालू के राज को कुछ यूं बताती हैं “मेरे हिसाब से जो अराजकता लालू के राज में थी वो पुरानी व्यवस्था को हिलाने के लिए जाबूझकर फैलायी गई थी। ऊंची जाति का अपमान और पुरानी व्यवस्था का बहिष्कार, लालू की राजनीतिक और सामाजिक रणनीति का हिस्सा थे।”

ऊंची जातियों के द्वारा सदियों तक दमन के बाद पिछड़ी जातियों का मनोवैज्ञानिक तौर पर सशक्त होना शायद लालू यादव की राजनीति का सार था और शायद इसलिए बिहार की जनता लालू यादव को आज भी वोट करती है और उनके साथ खड़ी होती है।इस पूरे समुदाय के लिए आत्मसम्मान खोई हुई प्रतिष्ठा पाना सबसे ज़रूरी चीज़ थी जो कि सदियों से चली आ रही बिहार की जातिवादी व्यवस्था ने उनसे छीन ली थी। और शायद लालू यादव, राज्य व्यवस्थाओं को कमज़ोर कर, पिछड़ी जाति के क्रिमिनल छवि वाले नेताओं को प्रोत्साहित कर और एक अराजकता का माहौल बनाकर, उन्हें यही लौटाने में सफल हुए थे।

हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं  है कि इन सबका सबसे बड़ा फायदा कुछ खास जातियों और वर्गों तक ही सीमित रह गया जैसे यादव। वो खुद भी शोषण करने लगें, जिसका दंश बिहार में आज भी देखने को मिलता है। लगभग 10 दिन पहले तेजस्वी यादव के विधानसभा क्षेत्र राघोपुर में ही यादव समुदाय के लोगों ने तथाकथित तौर पर ज़मीन विवाद में दलितों के घर में आग लगा दिया। 1995 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक लालू यादव ने जातीय हिंसा जो खासकर यादव समुदाय के लोगों द्वारा की जा रही थी उसको नज़रअंदाज़ कर दिया। लेकिन बिहार के ज़्यादातर क्षेत्रों लालू, OBC, दलित और मुस्लिमों के बीच गठबंधन बनाने में कामयाब रहे।

2015 के चुनाव नतीजों के बाद लालू यादव का 1990 का वो भाषण ट्रेंड करने लगा जिसमें वो आडवाणी को अयोध्या राम मंदिर बनाने को लेकर अपनी रथ यात्रा को समाप्त करने के लिए अपील कर रहे हैं। और इसके बाद आडवाणी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। रातों रात लालू मुस्लिम समाज के लिए एक हीरो बन गए थे।1989 भागलपुर हिंसा के बाद मुस्लिम समुदाय काँग्रेस से अलग हो रही थी और उन्हें लालू के रूप में अपना नया नेता मिल गया था। हालांकि यह कहानी तो लालू के सेक्युलर छवि गढ़ने की सबसे मशहूर कहानी है लेकिन ऐसे और भी कई किस्से हैं।

हालांकि ये सच है कि लालू के शासन में बिहार के कई हिस्सों में अराजकता का माहौल था लेकिन इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि उसी दौर में समाज के कई पिछड़े और शोषित वर्गों का भी उत्थान हुआ। और क्या वजह हो सकती है कि लाखों लोग एक ऐसे शख्स की पार्टी को वोट करेंगे जिसपर कई भ्रष्टाचार के मामलों में लिप्त होने का आरोप लगा है?

 

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