बकरी पालन से ‘अजामूत्र’ क्रांति: 5 बकरियों से सालाना 1 लाख से अधिक कमाई

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बकरी पालन-प्रो. संजीव कुमार

संवाददाता।पटना।भारत के ग्रामीण अंचलों में बकरी पालन हमेशा से छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका का मुख्य आधार रहा है। लेकिन अब यह क्षेत्र केवल मांस और दूध तक सीमित नहीं रह गया है।
आधुनिक शोध और विशेषज्ञ प्रो. संजीव कुमार के मार्गदर्शन में ‘अजामूत्र’ (बकरी का मूत्र) एक चमत्कारिक उत्पाद के रूप में उभर रहा है, जो किसानों की किस्मत बदलने की क्षमता रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में सही तकनीक और बाजार का तालमेल बिठाया जाए, तो बकरी का मूत्र ग्रामीण युवाओं और किसानों के लिए एक लाभदायक व्यवसाय बन सकता है।

बकरी पालन में क्रांति 
लघु पशुपालन विशेषज्ञ प्रो. संजीव कुमार ने इस दिशा में प्रकाश डालते हुए बताया कि बकरी के मूत्र में प्राकृतिक रूप से एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल और रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाने वाले दुर्लभ गुण पाए जाते हैं।
यही कारण है कि आयुर्वेद, स्किन केयर उत्पादों और जैविक खेती में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। पारंपरिक रूप से जिसे व्यर्थ समझकर फेंक दिया जाता था, वह अब अपनी औषधीय गुणवत्ता के कारण ‘लिक्विड गोल्ड’ साबित हो रहा है।

नई आर्थिक क्रांति
इस नई आर्थिक क्रांति को धरातल पर उतारने के लिए “TGT (टोटल गोट टेक्नोलॉजी)” मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रो. संजीव कुमार के अनुसार, इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य बकरी के शरीर से निकलने वाले हर उत्पाद का व्यावसायिक इस्तेमाल सुनिश्चित करना है। वर्तमान में TGT मॉडल के तहत बकरी के मूत्र को लगभग 100 रुपये प्रति लीटर की दर से बाजार में बेचा जा रहा है।
चौंकाने वाली बात यह है कि किसान स्तर पर इसके संग्रह और रख-रखाव की लागत महज 50 रुपये प्रति लीटर तक आती है, जो इसे एक उच्च मार्जिन वाला व्यवसाय बनाती है।

आय का गणित समझें
आय के गणित को समझाते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि यदि कोई छोटा किसान केवल 5 बकरियों के साथ इस मॉडल को अपनाता है, तो वह सालाना लगभग 1000 लीटर मूत्र एकत्रित कर सकता है। इससे उसे 50,000 से लेकर 1,00,000 रुपये तक की सीधी आय प्राप्त हो सकती है।
इसके अलावा, बकरी की लेड़ी (गोबर) भी खाद के रूप में बेहद कीमती है। 5 बकरियों से साल भर में करीब 1200 किलोग्राम लेड़ी प्राप्त होती है, जिसे 10 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचने पर 12,000 रुपये की अतिरिक्त कमाई होती है।
बकरी पालन
बकरी के दूध की गुणवत्ता
इतना ही नहीं, बकरी का दूध अपनी सुपाच्यता और पोषक तत्वों के कारण हमेशा मांग में रहता है। एक स्वस्थ बकरी से प्राप्त होने वाले दूध (लगभग 500 लीटर सालाना) को अगर 100 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बेचा जाए, तो यहाँ से भी 50,000 रुपये की आय सुनिश्चित है।
इस प्रकार, महज 5 बकरियों का एक छोटा सा यूनिट लगाकर किसान साल भर में 1 लाख रुपये से भी अधिक का शुद्ध मुनाफा कमा सकता है। यह मॉडल विशेष रूप से उन भूमिहीन किसानों या छोटे पशुपालकों के लिए वरदान है जिनके पास बड़े फार्म बनाने के संसाधन नहीं हैं।

संजीव कुमार का विजन
प्रो. संजीव कुमार का विजन है कि इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश के कोने-कोने तक पहुंचाया जाए। उनका मानना है कि बकरी के मूत्र से बनने वाले उत्पाद जैसे एंटी-डैंड्रफ शैम्पू, औषधीय टॉनिक और जैविक कीटनाशक न केवल भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी धूम मचा सकते हैं।
इससे ग्रामीण युवाओं के लिए ‘एग्रो-स्टार्टअप’ और निर्यात (एक्सपोर्ट) के नए अवसर खुलेंगे।

पर्यावरणीय महत्व
यह पहल केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे पर्यावरणीय महत्व भी हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते दुष्प्रभावों के बीच बकरी का मूत्र एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बनकर उभरा है।
जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और फसलों को रोगों से बचाता है।

ग्रामीणों को लाभ
प्रो. संजीव कुमार और उनकी टीम की यह पहल ग्रामीण भारत के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है। “TGT मॉडल” ने यह साबित कर दिया है कि अगर नवाचार और इच्छाशक्ति हो, तो छोटे से छोटे संसाधन से भी बड़ी समृद्धि हासिल की जा सकती है।
आने वाले समय में बकरी पालन केवल एक सहायक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक संगठित उद्योग के रूप में विकसित होगा, जो आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में मदद करेगा।

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