लखनऊ। पूर्वांचल की सियासी फिजाओं में इन दिनों एक ऐसा चेहरा चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसने सुरक्षा और स्थिरता वाली सरकारी नौकरी को केवल इसलिए ठुकरा दिया ताकि वह समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज बन सके।
हम बात कर रहे हैं दिनेश कुमार यादव की, जिन्होंने साल 2021 में जनसेवा के कठिन मार्ग को चुना और आज ‘समाजवाद’ को केवल एक विचारधारा नहीं बल्कि अपनी जीवनशैली बना चुके हैं। संविधान के प्रति अटूट आस्था और अपनी जड़ों से ‘दिल से देसी’ जुड़ाव रखने वाले दिनेश, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के विचारों को गांव-गांव की मेढ़ तक पहुंचा रहे हैं।
एक समृद्ध राजनीतिक विरासत से आने के बावजूद तपती धूप में पसीना बहाकर अपनी अलग पहचान गढ़ने वाले दिनेश यादव से हुई आदर्शन समाचार की एक विशेष और बेबाक बातचीत के मुख्य अंश…
रिपोर्टर: आप एक समृद्ध राजनीतिक विरासत से आते हैं। इस विरासत का आपके जीवन पर कितना प्रभाव रहा? “वंशवाद” के आरोपों के बीच आप अपनी पहचान अलग कैसे बनाएंगे?
दिनेश कुमार यादव: विरासत में आपको ‘नाम’ मिल सकता है, लेकिन ‘जनता का विश्वास’ नहीं। विश्वास कमाने के लिए आपको तपती धूप में सड़क पर उतरना पड़ता है। मेरी पहचान मेरे उपनाम से नहीं, बल्कि मेरे उन कार्यों से बन रही है जो मैं जमीनी स्तर पर कर रहा हूँ। मैं विरासत को एक जिम्मेदारी मानता हूं, विशेषाधिकार (Privilege) नहीं।मेरा उद्देश्य विरासत को केवल ढोना नहीं, बल्कि उसे आधुनिक और वैचारिक रूप से समृद्ध करना है।
निश्चित रूप से एक राजनीतिक परिवार से आने का मुझ पर गहरा प्रभाव रहा है। मेरे चाचा श्री हवलदार यादव जी ने वर्षों तक निस्वार्थ भाव से जनसेवा की है। मैंने बचपन से देखा है कि राजनीति का असली अर्थ लोगों के बीच रहना और उनकी समस्याओं को समझना है। यही सीख मुझे प्रेरित करती रही और इसी के चलते मैंने जनसेवा का कठिन मार्ग चुना।

रिपोर्टर: सरकारी नौकरी छोड़ना एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सबसे बड़ा ‘जोखिम’ माना जाता है। आपने 2021 में यह साहसिक कदम उठाया; क्या कभी पीछे मुड़कर देखने पर डर लगता है?
दिनेश कुमार यादव: डर तब लगता है जब लक्ष्य स्पष्ट न हो। नौकरी में मैं एक सीमित व्यवस्था का हिस्सा था, जहां मैं गिने-चुने लोगों की ही मदद कर सकता था।
लेकिन राजनीति वह ‘चाबी’ है जिससे आप पूरी व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। मेरे चाचा ने हमेशा सिखाया कि ‘सत्ता सुख के लिए नहीं, संघर्ष के लिए होती है।’ जिस दिन मैंने इस्तीफा दिया, उस दिन मुझे अपनी सुरक्षा खोने का दुख नहीं, बल्कि लाखों वंचितों की आवाज बनने की खुशी थी। निर्णय आसान नहीं था, लेकिन वैचारिक रूप से बिल्कुल स्पष्ट था।
रिपोर्टर: दिनेश जी, आज के दौर में जब राजनीति ‘इवेंट मैनेजमेंट’ बनती जा रही है, आप ‘समाजवाद और संविधान’ जैसे गंभीर विषयों पर बात कर रहे हैं। क्या यह युवाओं को उबाऊ नहीं लगता?
दिनेश कुमार यादव: (मुस्कुराते हुए) देखिए, उबाऊ तब लगता है जब आप केवल भाषण दें। हमारी बातचीत ‘भाषण’ नहीं बल्कि ‘संवाद’ है—अपने लोगों के बीच एक सहज संवाद। मैं युवाओं से कहता हूँ कि अगर आपकी जेब में रखा ₹10 का नोट आज सुरक्षित है, तो वह केवल संविधान की वजह से है।
हम उन्हें बताते हैं कि सामाजिक न्याय कोई किताबी शब्द नहीं, बल्कि सम्मान से जीने का हक है। जब युवा अपनी बेरोजगारी, अपनी शिक्षा और अपने हक को संविधान की धाराओं से जोड़कर देखता है, तो उसकी आंखों में एक नई चमक आ जाती है। यह उबाऊ प्रक्रिया नहीं, बल्कि जागरूक होने का उत्सव है।
रिपोर्टर: आपका एक स्लोगन बहुत चर्चित है— ‘दिल से देसी’। एक आधुनिक युवा नेता के लिए ‘देसी’ होने के क्या मायने हैं?
दिनेश कुमार यादव: ‘देसी’ होने का अर्थ पिछड़ा होना कतई नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ अपनी जड़ों के प्रति ईमानदार होना है। मैं लैपटॉप भी चलाता हूं और खेत की मेढ़ पर बैठकर किसान के साथ गुड़-चाय भी पीता हूँ।
‘दिल से देसी’ वह है जो दुनिया भर की तकनीक सीखे, लेकिन जिसकी संवेदनाएं हमेशा अपने गांव, अपनी मिट्टी और समाज के अंतिम व्यक्ति से जुड़ी रहें।
रिपोर्टर: वर्तमान राजनीतिक माहौल में ‘समाजवाद’ की प्रासंगिकता क्या है?
दिनेश कुमार यादव: जब तक समाज में ऊंच-नीच है, जब तक एक बीमार को इलाज के लिए अपनी जमीन बेचनी पड़ रही है और एक मेधावी छात्र आर्थिक अभाव में पढ़ाई छोड़ रहा है, तब तक समाजवाद प्रासंगिक रहेगा।
समाजवाद का अर्थ है— अवसरों की समानता। हम एक ऐसा समाज चाहते हैं जहाँ अवसर मुट्ठी भर लोगों के पास न होकर, हर हाथ में हों। मेरे लिए समाजवाद केवल एक राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस भारत का सपना देखा था, वह समानता, न्याय और स्वतंत्रता पर आधारित था।
भारतीय संविधान उसी सपने को साकार करने का माध्यम है। आज जरूरत है कि हम युवाओं को यह समझाएं कि संविधान केवल एक किताब नहीं, बल्कि उनके अधिकारों और कर्तव्यों की जीवंत नींव है।
रिपोर्टर: आने वाले 5 वर्षों में आप खुद को कहाँ देखते हैं?
दिनेश कुमार यादव: मेरा सपना है कि उत्तर प्रदेश का हर ब्लॉक ‘संविधान जागरूकता केंद्र’ बने। मैं कहां रहूँगा, यह जनता तय करेगी; लेकिन एक समाज के बेटे, एक नागरिक और समाजवाद के साधक के तौर पर मेरा स्थान तय है—वह है जनता के बीच।
मेरे लिए राजनीति कोई पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम है। अगर मैं लोगों के जीवन में थोड़ा भी सकारात्मक बदलाव ला पाऊं, तो यही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
रिपोर्टर: क्या 2027 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में परिवर्तन होने जा रहा है?
दिनेश कुमार यादव: देखिए, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी ने एक नई राजनीति की शुरुआत की है। उन्होंने भ्रामक और काल्पनिक ‘जार्गन’ नहीं गढ़े हैं, बल्कि राजनीति को संविधान, समाजवाद और सामाजिक न्याय के केंद्र में पुनः स्थापित किया है। यही तो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का सपना था।
परिवर्तन की लहर बहुत स्पष्ट महसूस हो रही है; उत्तर प्रदेश अखिलेश जी के विजन को बड़ी उम्मीदों से देख रहा है। जैसा कि फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश ने कहा था— ‘बिना उम्मीद के हमारा कोई भविष्य नहीं।’ परिवर्तन निश्चित है।















