मां सरस्वती की उपासना

30
0
SHARE

प्राची जुवेकर ( सनातन संस्था)

‘सरसः अवती’, अर्थात एक गति में ज्ञान देनेवालीं (गतिमति) । श्री सरस्वतीदेवी निष्क्रिय ब्रह्मा का सक्रिय रूप हैं; इसीलिए उन्हें ‘ब्रह्मा-विष्णु-महेश’, तीनों को गति देनेवाली शक्ति कहते हैं ।
आ. कुछ अन्य नाम
१. शारदा : शारदा अर्थात षट्शास्त्रों के अध्ययन को अर्थात ज्ञान को आधार प्रदान करनेवाली । विशेषता यह है कि इस देवी की शक्ति श्री गणपति से संबंधित है और उनकी साडी का रंग लाल-गुलाबी है ।
२. वाक्, वाग्देवी, वागीश्वरी, वाणी, भारती, वीणापाणी, वाणीदायिनी, स्वरदायिनी, ज्ञान-दायिनी इत्यादि ।
१. श्री सरस्वतीदेवी के कोप से कष्ट एवं नरकप्राप्ति होना
अ. श्री सरस्वतीदेवी की अवहेलना करनेवालों को एवं दुष्कृत्य करनेवालों को विद्या एवं कला प्राप्त न होना, आत्मज्ञान न होना तथा नरकप्राप्ति होना
ऐसे जीव कितनी भी साधना करें, उन्हें आत्मज्ञान अथवा आत्मसाक्षात्कार नहीं होता । दुष्कृत्य करनेवाले का आध्यात्मिक स्तर ७० प्रतिशत से अधिक हो, तो उसे कदाचित आत्मज्ञान अथवा आत्मसाक्षात्कार होगा; परंतु उसे उसका तत्काल विस्मरण हो जाएगा । किसी कारण श्री सरस्वतीदेवी धनवान, रूपवान एवं बलवान लोगों से रुष्ट हो जाएं, तो उनमें ज्ञानार्जन की इच्छा नष्ट हो जाती है । अनेक प्रयत्न करने पर भी उन्हें न विद्या प्राप्त होती है, न कला ! साधना से प्राप्त ज्ञान का दुरुपयोग होने पर श्री सरस्वतीदेवी रुष्ट हो जाती हैं; फिर चाहे उस जीवने कितनी ही साधना क्यों न की हो, उस जीव को नरकप्राप्ति होती है ।
आ. विद्या का अनुचित (अधर्म हेतु) उपयोग व श्री सरस्वतीदेवी का निरादर करनेवालों का तीन जन्म अपंग होना, बुद्धि भ्रष्ट एवं मंद होना तथा नरकप्राप्ति होना
८० प्रतिशत जन्मजात मंदबुद्धि बालकों द्वारा गत जन्मों में श्री सरस्वतीदेवी का अपमान किया गया होता है ।
देवता, संत व महात्माओं का अपमान, उनके विषय में समाज को दिशाभ्रष्ट कर, अधर्म का प्रसार करने वालों का उसी जन्म में अपनी वाणी खो देना, अपंग होना, महारोगी होना एवं मृत्यु के पश्चात नरकप्राप्ति होती है ।
‘विद्या विनयेन शोभते ।’ उक्ति के अनुसार श्री सरस्वतीदेवी को ‘अल्प अहं’वाला उपासक अधिक प्रिय है । विनम्र, शरणागत एवं कृतज्ञभाव से संपन्न उपासक यद्यपि कुछ न मांगे, तो भी श्री सरस्वतीदेवी उसे स्वयं अधिक ज्ञान एवं विद्या प्रदान करती हैं ।
२. श्री सरस्वती की उपासना से संभाव्य प्राप्ति
अ. उपनिषद् में श्री सरस्वती की वाणी से एकरूपता मानी गई है । प्रज्ञावृद्धि एवं वाणी में मिठास के लिए उनसे प्रार्थना की गई है ।
आ. कलाप्राप्ति :* शिव, श्री गणपति एवं सरस्वती देवी कला एवं ज्ञान के प्रमुख देवता हैं । श्री सरस्वतीदेवी की कृपा से बुद्धि प्रगल्भ होती है ।
इ. विद्याप्राप्ति :* प्रमुख १८ विद्या, विविध उपविद्याएं व माया की विविध विद्या को सीखने हेतु, जीव के लिए श्री सरस्वतीदेवी की उपासना आवश्यक है ।
ई. ज्ञानप्राप्ति :* श्री सरस्वतीदेवी के हाथ में वेद हैं; अर्थात वे ज्ञान की उपास्यदेवता हैं एवं उनके पास सर्वोच्च ज्ञान है । श्री सरस्वतीदेवी की उपासना से उपासक की बुद्धि सात्त्विक बनती है । इसलिए कठिन ज्ञान को भी वह सहजता से ग्रहण कर पाता है ।
उ. बुद्धि सात्त्विक बनना :* श्री सरस्वती देवी की उपासना से उपासक की बुद्धि सात्त्विक बनती है । अपने प्रत्येक कर्म पर उसका ध्यान रहता है एवं चूकों की मात्रा भी घट जाती है । उच्च स्तर के उपासक की बुद्धि इतनी सात्त्विक बनती है कि उसे ईश्वर आंतरिक मार्गदर्शन करते हैं । ’
३. सरस्वती यंत्र, उसका कार्य एवं पूजन का महत्त्व
अ. सामान्यतः बनाया जानेवाला श्री सरस्वती देवी का यंत्र
आ. यंत्र का प्रमुख कार्य*
‘विशिष्ट देवता का तत्त्व आकर्षित कर, उसमें से उस देवता के उपासक के लिए (उपासना हेतु) आवश्यक तारक अथवा मारक शक्ति प्रक्षेपित करना यंत्र का प्रमुख कार्य है ।’
सरस्वती यंत्र में ३ प्रतिशत सरस्वतीतत्त्व है, जिसका लाभ उपासक को होता है । यंत्र के कारण उपासक के मन पर काली शक्ति का आवरण नहीं आता । यंत्रदर्शन करते हुए मंत्रोच्चारण इत्यादि साधना करने से, बुद्धि एवं वाणी शुद्ध एवं सात्त्विक बनती हैं । नित्यमितरूप से यंत्र की भावपूर्वक पूजा करनेवाले पर श्री सरस्वतीदेवी प्रसन्न होती हैं । वह कठिन विद्या भी अल्प काल में अर्जित कर पाता है ।
यंत्र के इस महत्त्व एवं लाभ के कारण ही नववर्षारंभ पर श्री सरस्वतीपूजन करते हैं । विद्यालय में जानेवाले विद्यार्थियों द्वारा प्रयुक्त स्लेट पर, पूजा के लिए सरस्वती यंत्र बनाने की प्रथा है । यह श्री सरस्वतीदेवी की उपासना का ही एक अंग है ।’
(संदर्भ : सनातन निर्मित लघुग्रंथ – सरस्वती)

LEAVE A REPLY