होलिका दहन को लेकर अक्सर यह भ्रम होता है कि इस दिन होलिका की पूजा की जाती है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। यह अनुष्ठान किसी राक्षसी का सम्मान करने के लिए नहीं, बल्कि अग्नि को साक्षी मानकर बुराई, अहंकार और नकारात्मकता के अंत का प्रतीकात्मक संस्कार है।
भारतीय परंपरा में अग्नि को शुद्धि, परिवर्तन और नवआरंभ का देवत्व माना गया है। इसलिए होलिका दहन से पहले जो विधि-विधान होते हैं, वे अग्नि और मंगलकामना से जुड़े होते हैं, न कि होलिका के महिमामंडन से।
पौराणिक कथा में होलिका को ऐसा वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी, लेकिन उसने उस शक्ति का दुरुपयोग करते हुए भक्त प्रह्लाद को हानि पहुँचाने का प्रयास किया।
परिणामस्वरूप वही अग्नि उसके अहंकार का कारण बनी और वह स्वयं भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद की भक्ति की रक्षा हुई। इस प्रसंग का संदेश स्पष्ट है,अन्याय और दुरुपयोग की शक्ति टिकती नहीं, जबकि सत्य, श्रद्धा और धर्म अंततः विजयी होते हैं। इसी स्मृति में होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बन गया।
लोकजीवन में इसका संबंध ऋतु परिवर्तन और कृषि चक्र से भी रहा है। फसल के समय लोग सामूहिक रूप से अग्नि प्रज्वलित कर वातावरण की शुद्धि, रोगों से रक्षा और समृद्धि की कामना करते थे।
इस प्रकार यह पर्व केवल एक कथा का स्मरण नहीं, बल्कि जीवन से नकारात्मकता को त्यागकर नए, उजले और संतुलित आरंभ का सामूहिक संकल्प है। होलिका दहन हमें हर वर्ष यही याद दिलाता है कि असली दहन बाहर की होलिका का नहीं, बल्कि भीतर के अहंकार और दुर्भावनाओं का होना चाहिए।















