खगौल का बदहाल रंगमंच,प्रेक्षागृह को बनाया सामुदायिक भवन

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सुधीर मधुकर.खगौल. प्रेक्षागृह और सुविधाओं के आभाव में स्थानीय करीब एक दर्जन से अधिक नाट्य संस्थाओं की गतिविधियाँ ठप्प है | साथ ही करीब 100 से अधिक कलाकार इस से प्रभावित हुए हैं | प्रतिभायें दम तोड़ रही है | इस का मुख्य कारण रेलप्रशासन और मान्यता प्राप्त रेलवे संगठन की साजिश के तहत दानापुर रेल मंडल मुख्यालय स्थित सांस्कृतिक धरोहर एनसी घोष इंस्टीच्यूट को सामुदायिक भवन बना देना है |

इसे रंगमंच के इतिहास में एक काला इतिहास के रूप में माना जा रहा है| यह बातें विश्व रंगमंच दिवस पर रंगमच में सक्रिय रहे वरिष्ठ कलाकार,वी वासुदेव, विजय कुमार सिन्हा, नवाब आलम,उदय कुमार, अम्बिका सिन्हा,ज्ञानी प्रसाद, मो.सज्जाद,जयप्रकाश मिश्र,दीपनारायण शर्मा,दिलीप देशवाशी आदि ने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा है| जब से इस सांस्कृतिक धरोहर को सामुदायिक भवन बना दिया गया,इस की उपयोगिता सिर्फ शादी विवाह तक ही सीमित हो कर रह गया है | पहले जहाँ मात्र 300 में हॉल मिल जाता है | इस का किराया बढ़ा कर 20 हजार कर दिया गया है | लाईट.साउंड,कुर्सी आदि अगल से करना पड़ता है | यहाँ तक की पर्दा भी अपने से लगाना पड़ता है | जबकि पटना का कालिदास रंगालय अव्यवसायिक संस्थाओं को मात्र 1800 और वातानुकूलित प्रेमचंद रंगशाला 5000 में सभी सुविधाओं के साथ उपलब्ध है | खगौल में ऐसा न कोई हॉल है और खेल मैदान या लाइब्रेरी ही- जहाँ कलाकार और खिलाड़ी अपना प्रदर्शन कर सके | स्थानीय नगर परिषद् की भूमिका सिर्फ सड़क और नाला निर्माण तक ही सीमित रहा गया है |

इन चीजों के प्रति इनकी संवेदनशीलता भी नहीं है कि यहाँ की प्रतिभावान कलाकार,खिलाड़ी और पढ़े लिखों के लिए भी सोंच विकसित करें|इन सब कारणों से खगौल और आसपास के कलाकार और रंगमंच पूरी तरह से प्रभावित हुआ है | प्रेक्षागृह के अभाव में अव्यवसायिक संस्थाओं की सक्रियता लगभग समाप्त हो चुकी है | फिलहाल सिर्फ एनजीओ वाली संस्थायें नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से रंगकर्म को जिन्दा रखे हुए हैं |

वर्ष 1925 के आसपास अंग्रेजी शासनकाल में स्थापित एनसी घोष का अतीत में एक अपना इतिहास रहा है | यहाँ अंग्रेजों के मनोरंजन के लिए लकड़ी का अंडरग्राउंड मंच बना हुआ था | इस हॉल में उस समय यहाँ भारतीय नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था | आजादी के बाद इस में भारतीय नागरिकों का प्रवेश संभव हुआ है | बिलियर्ड खेलने के लिए यहाँ दूर-दूर से खिलाड़ी आते थे | रंगमंच के इतिहास में अपनी पहचान बनाने वाला खगौल में सांस्कृतिक धरोहर एनसी घोष एक मात्र प्रेक्षागृह था | यहाँ से ही पटना रंगमंच को भी सक्रियता मिली है |

यहाँ के सक्रिय रहे कलाकार स्व.शिवशंकर सिंह,निरंजन प्रसाद,रजाक मियाँ, एमए सलाम, हरिदेव विश्कर्मा, सम्मी खान, फिल्म संगीतकार श्यामसागर,आरपी वर्मा तरुण, आरएन चतुर्वेदी,आरएन प्रसाद,अशोक पंडित तथा वर्तमान में वी वासुदेव, सरुर अली अंसारी,नवाब अलाम ,राजबल्लभ प्रसाद,अनिरुद्ध पाठक,विनोद प्रसाद,विजय कुमार सिन्हा ,मिथिलेश पाण्डेय,संजीव कुमार जवाहर ,दीपक दयाल,वीरेंद्र कुमार सिन्हा,अरुण सिंह पिंटू,ज्ञानी प्रसाद,उदय कुमार ,महेंद्र पंडित,जयप्रकाश मिश्र,मनोज सोनी,सारिका,रेखा,मनाली,सोनी,आदि वरिष्ठ रंगकर्मियों के साथ साथ करीब 100 कलाकारों की एक पूरी जमात आज भी है |‘रागरंग ’ और  ‘चतुरंग ’नाट्य संस्था से शुरू हुआ नाटकों के मंचन की दौड़ में करीब एक दर्जन से अधिक नाट्य संस्थाएं इस छोटे से क़स्बा में रंगमंच के इतिहास में अपनी अलग की पहचान बना चुका है | पर प्रेक्षागृह और सुविधाओं के आभाव सक्रिय नहीं रहे |

इस बहुद्देशीय हॉल में शादी विवाह अन्य कार्यकर्मों के साथ साथ हर महीना औसतन तीन-चार नाटकों आदि की प्रस्तुतियां होती थी | संयुक्त प्रयास से भारतीय एकजुट सांस्कृतिक संघ एवं अन्य संथाओं की ओर से अखिलभारतीय स्तर पर नाट्य महोत्सव और लोकनृत्य महोत्सव और प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाता था | जिस में देश भर की नाट्य संस्थाएं और अंतर्राष्ट्रीय कलाकार शामिल होते थे |

 

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