चावल घोटाला-3,अब भूसे पर लाठी पीट रही है सरकार

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राकेश प्रवीर.

पटना। सैकड़ों करोड़ का चावल लापता हैं। आखिर ये चावल गए कहां, किसने लूटा? किससे उसकी वसूली होगी? कब होगी? किस तरह होगी? ये सारे सवाल मुंह बाये खड़े हैं, मगर सरकार भूसे पर लाठी पीट रही है। पिछले साल जब यह मामला विधान मंडल में काफी गरमाया तो तत्कलीन खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्याम रजक ने बताया कि डिफाल्टर चावल मिलों से 162 करोड़ रुपये की वसूली की जा चुकी है और 1,418 करोड़ रुपये की वसूली अभी बाकी है। डिफाल्टर 2,058 चावल मिलों में से 293 ने धनराशि जमा कर दी है। 1,525 मिलों के खिलाफ सर्टिफिकेट केस किए गए हैं,जबकि 203 के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। उन सभी 1,525 मिलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया गया है, जिनके खिलाफ सर्टिफिकेट केस किए गए हैं। तब तत्कालीन मंत्री ने बेस गोदाम के संबंध में बताया कि 122 पदाधिकारियों पर कार्रवाई शुरू की गई है और उनसे1.25 करोड़ रुपये वसूले गए हैं, जबकि 17 के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई है। बरामद किए गए धान की नीलामी से 12.01 करोड़ रुपये हासिल हुए हैं,वहीं बरामद किया गया 1.44 लाख मीट्रिक टन धान अभी बेस गोदाम में रखा हुआ है। जबकि पूरे प्रकरण पर सीएजी रिपोर्ट में कहा गया कि 2011-12 में चावल मिलों से वसूली से 43.94 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं।

इस बीच जानकारों की मानें तो करीब 1200 करोड़ रुपये की कीमत के चावल का पता नहीं है। सरकार की एजेंसी बीएसएफसी ने धान को मीलिंग के लिए राइस मिलों को दिया था। मिलों से छह लाख टन चावल नहीं मिला। इसकी कीमत 1200 सौ करोड़ रुपये होती है। सरकार ने केवल एक जिले में इस गोलमाल की जांच का जिम्मा विजिलेंस को दिया है। 32 राइस मिलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया है। वर्तमान खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री मदन सहन भी फिलहाल इस मामले में कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है।

किसानों से धान खरीद के मामले में रिकार्ड का दावा करने वाली सरकार के होश तब फाख्ता हो गये जब तय मात्रा में राइस मिलों से चावल नहीं लौटा। बताया जाता है कि साल 2011-12 में एसएफसी ने 4 लाख 55 हजार टन और पैक्सों ने 17 लाख 5 हजार टन धान की खरीद किसानों से1080 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की। सरकार ने बीएसएफसी को धान खरीद के लिए नोडल एजेंसी बनाया था। बीएसएफसी से एफसीआई को चावल जाता है और वहां से पीडीएस के जरिये गरीबों तक पहुंचता है।

राज्य के सभी जिलों में धान की खरीद हो जाने के बाद उसे राइस मिलों को दे दिया गया। एक क्विंटल धान में चावल की रिवकरी 67 किलो होनी चाहिए। मोटे तौर पर कुल खरीदे गये धान से सरकार को 14.47 लाख टन चावल मिलनी चाहिए थी। लेकिन अब तक केवल 8.56 लाख टन की चावल मिल सका है। इस तरह करीब 6 लाख टन चावल नही मिल पाया है। तब 1900 रुपये चावल की दर निर्धारित थी। इस आधार पर 6 लाख टन गायब चावल की कीमत करीब 1200 सौ करोड़ रुपये होती हैै। चावल रिकवरी के लिए सरकार ने 12 दिसंबर, 2014 तक की तारीख तय की थी। हालांकि मीलिंग का समय अप्रैल-मई तक ही होता है। धान की खरीद नवंबर से मार्च तक होती है। ऐसे में यह समझा जा सकता है कि चावल रिकवरी के लिए सात महीने की लंबी अवधि क्यों रखी गयी?

सूत्रों के अनुसार धान खरीद से लेकर उसे मीलिंग के लिए मिलों को देने तक की प्रक्रिया में जमकर गड़बड़ी हुई है। पिछले साल तो रोहतास जिले में एक दिन में ही 50 हजार टन की खरीद दिखायी गयी थी। इसी प्रकार धान उत्पादन में फिसड्डी रहने वाले जिलों में भी बड़ी मात्रा में धान की खरीद की गयी है। जाहिर है कि इसका बड़ा खेल सिर्फ कागजों पर खेला गया है। अब धान की भरपाई कहां से होगी, यह बड़ा सवाल हैै। भारत के लेखा महारीक्षक ने तो कुछ जिलों का सैम्पल परीक्षण किया है। अगर विस्तृत और व्यापक जांच की जाए तो वाकई यह घोटाला कई हजार करोड़ तक जाएगा जो निष्चित ही पूर्व में हुए चारे घोटाले को काफी पीछे छोड़ देगा।

 

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