जहां चुनाव में ही लगता मेला

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रिंकू पाण्डेय,पटना.कुछ साल पहले प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रियदर्शन की एक फिल्म आई थी. हंगामा. उसमें गांव के एक भोले-भाले युवक का किरदार निभाया था राजपाल यादव ने. कसा हुआ अभिनय किया था उन्होंने. जानदार कह सकते हैं. भ्रमजाल के चंगूल में फंसे राजपाल अपने को बचाने के लिए स्टेशन के एक सस्ते से लॉज में ठहरने जाते हैं. लॉज का मैनेजर पूछता है नाम. राजपाल कहते हैं. तुलसी दास खान. क्योंकि लॉज में नाम बदलकर रहना था. फिर एक गुंडे शक्ति कपूर के गुर्गों द्वारा निर्दोष राजपाल की जमकर पिटाई की जाती है. पीटे जाने के ठीक बाद राजपाल का डायलॉग है. अबे सालों मैं कोई मंदिर का घंटा हूं जो आता है बजाकर चला जाता है. कुछ ऐसा ही होता आया है बिहार की दलित और  पिछड़ी जातियों के साथ. आजादी के बाद से लेकर आजतक राजनीतिक पार्टियों ने इन जातियों को सिर्फ मंदिर का घंटा ही समझा है. जिस पार्टी और दल को इन जातियों से लाभ लेना हुआ. उन दलों ने इन्हें वायदों का एक ऐसा सब्जबाग दिखाया जिसमें ये फंस गए. इनकी समाजिक,आर्थिक और समाजिक स्थिति को बदले का वाद कर नेता इन्हें मंदिर के घंटे की तरह बजाते रहे. ये लोग वोट देते रहे,सरकारें बनती रही. लेकिन इनकी स्थिति में कुछ सुधार नहीं हुआ. आज भी बिहार के किसी इलाके में चले जाईए इनकी बस्तियों में एकाध पढ़े लिखे दलालनुमा टाइप का नेता इन्हीं के समाज से मिल जाएगा. जो इनके वोटों का हर चुनाव में सौदा कर लेता है. ये बस स्टांप बनकर रह जाते हैं. राज्य की संकल्पना लोक कल्याणकारी के रूप में की गई है. संविधान इसका गवाह है. इन्हें इनके मौलिक अधिकारों को प्रदान करने का लालच देकर इनसे वोट लिया जाता है. जबकि ये इनका मौलिक अधिकार है. साठ साल बीत गए जमीन का एक टुकड़ा. जिसपर इनका कब्जा नहीं. सरकार की दी गई एक रेडियो जो बजती नहीं. इनकी किस्तम का यही रिजल्ट है. बिहार विधान सभा चुनाव में एक बार फिर इनकी बस्तियां गुलजार है. नेताओं का आना जाना इन बस्तियों में शुरू हो चुका है. लोकलुभावन वादे,इनके बच्चों को अच्छी शिक्षा,इन्हें रहने का घर और भी बहुत कुछ लालच. फलाने नेता आपके सच्चे हितैषी हैं. फलाने आपके दुश्मन हैं. ये आवाजें इनकी बस्तियों में गुंजने लगी हैं. कारण है बिहार में बिना इनके वोट की किसी सरकार तो बनने से रही. इसलिए इन्हें लुभाना बहुत जरूरी है. बिहार दलितों को नेताओं ने अबतक सिर्फ आश्वासनों की खुराक ही दी है.  जमीनी स्तर पर उनके जीवन में कोई तब्दीली आई हो ऐसा नहीं दिखता. यह पूरी तरह सच है कि यदि भारतीय संविधान में वादे से मुकरने पर कोई एफआईआर दर्ज होने का प्रावधान होता तो सबसे ज्यादा पिछड़ी जातियों के लोग बिहार के नेताओं पर ये दर्ज करवाते.

         बिहार में चुनाव का माहौल बनने लगा है. और इस समय सूबे की तमाम जातियां दो गठबंधनों या महागठबंधनों के नेताओं के चंगूल में हैं. हालांकि ये बहुत महत्वपूर्ण है कि इस चुनाव में अति पिछड़ी जाति के वोटर महत्वपूर्ण भूमिका में रहेंगे. अति पिछड़ी जाति यानी ओबीसी कटेगरी वाले वोटरों की संख्या ठीक-ठाक नहीं बताई जाती है लेकिन अनुमानतः देखा जाए तो बिहार के कुल वोटरों में इनकी संख्या 25 से तीस फीसदी है. दलित वोटरों के मिजाज पर नजर डालें इनमें से कुछ जातियों का मिजाज किसी एक को सपोर्ट करने का दिखता है. जबकि अति पिछड़ी जातियों का वोट बंटा हुआ नजर आता है. जो आज की तारीख में तीस फीसदी के करीब हैं. वजह भी साफ हैं. इन्हें आज भी सस्पेंस हैं कि आखिर हम मंदिर के घंटे की तरह बजेंगे या हमें रियल में कोई मसीहा मिलेगा नेता के रूप में. एक वजह ये भी है कि इन सभी जाति का एक जाति से न होना. अति पिछड़ा वर्ग की बहुत सी जातियां जिनमें लुहार,कुम्हार,बढ़ई,सुनार,कहांर,केवट और साहू तेली हैं. ये सभी जातियां अपने पारंपरिक कार्यों में लगी रहने वाली हैं. गत कुछ चुनावों पर नजर डालें तो यह साफ दिखता है कि अलग-अलग जातियों के वोटर चुनाव में एकजुट होकर अपनी पसंद की पार्टी को चुनते हैं. अगर यादव लालू को सपोर्ट करते हैं तो कुर्मी जाति के लोग नीतीश कुमार को सपोर्ट करते हैं.

उसी तरह भाजपा के साथ आज भी ऊंची जाति के लोग बने हुए हैं. लेकिन हाल के दिनों में रामविलास और जीतन राम मांझी के भाजपा के साथ आने के बाद अब कुछ बदलने वाला है. बदलाव की दस्तक जीतन राम मांझी के दलित होने से शुरू होती है. बिहार के दलितों में यह साफ संदेश गया है कि आज भी बिहार के लालू,नीतीश या कोई भी अपने आप को इलीट कहने वाला नेता एक दलित के बेटे को बरदास्त नहीं कर सकता. जीतन राम मांझी का कुर्सी से हटने की घटना ने दलितों के बीच एक साफ संदेश भेजा कि आज भी उन्हें राजकाज या उच्च पदों पर लोग नहीं देख सकते. जीतन राम मांझी का भोला-भाला चेहरा और उनकी संवेदना से भरी बातों ने भी दलितों को प्रभावित किया. इस बार वे मन बना चुके हैं कि जीतन राम मांझी को सपोर्ट करेंगे. भाजपा के पक्ष में दलितों के जाने के एक कारण ये भी है कि रामविलास पासवान के साथ जो दलित जातियां हैं उन्हें लगता है कि रामविलास ही उनके कर्णधार बन सकते हैं. हालांकि रामविलास ने भी दलितों को सिर्फ मंदिर का घंटा ही समझा और जब मन किया तब बजाया और अपने राजनीतिक स्वार्थ को सिद्ध किया. रामविलास की राजनीति दलितों से ज्यादा सत्ता में बने रहने की रही. इसीलिए अन्य किसी नेता के मुकाबले वो ज्यादाबार मंत्री रहे. और किसी भी गठबंधन के प्रिय रहे. वर्तमान में स्थिति ये है कि एकजुट होकर बड़ी संख्या में किसी जाति के वोटरों का किसी खास जाति के पक्ष में मतदान करने के पीछे सबसे बड़ी वजह उस नेता का विशेष जाति से संबंध रखना है.

एक बार और गौर करने लायक है कि दलितों और पिछड़ी जातियों में कद्दावर नेता का ना होना इनके लिए काफी कष्टदायक होता है. और इनके वोट बंट जाते हैं. बिहार चुनाव में किसी भी पार्टी के इतिहास को उठाकर देख लीजिए एकाध को छोड़ दें तो कोई भी पार्टी अपने उम्मीदवारों के रूप में दलितों और पिछड़ों को पसंद नहीं करती हैं. हां ये बात और है कि उन्हें पार्टी की मजबूती के लिए वोट बैंक के रुप में प्रयोग कर लिया जाता है. कोई एक ऐसा नेता बताईए जिसने दलित बस्तियों में रात गुजारी हो. उनके सुख-दुखः में शामिल हुआ हो. ऐसा नहीं मिलेंगे. चुनाव आते ही सफेद झक्क खादी पहनकर दलित बस्तियों में नाक सिकोड़कर अपने स्वार्थ के लिए जाने वाले नेता क्या समझेंगे आखिर दर्द क्या होता है.

जो दलितों के बारे में सोचता भी है वह तभी तक सोचता है जबतक उसके हाथ से सत्ता और सियासत दूर रहती है. जैसे ही उसे कोई पद मिल जाए या मंत्री बन जाए तो वो अपने ही लोगों को अमानित करने से भी नहीं चूकता. शायद यहीं कारण है कि आज भी दलित बस्ती और पिछड़ी जातियों के लोग सबसे ज्यादा कम भरोसा नेताओं और राजनीतिक दलों पर करते हैं. उनकी गरीबी अभिशाप बनकर उनके पीछे खड़ी होती है. उन्हें चुनाव का मतलब यहीं पता है कि उस दिन दारू और कुछ पैसे हाथों में पकड़ा दिए जाते हैं. वहीं दारू और पैसा उनके लिए लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव का प्रसाद होता है. और वो अपना किमती मत उस नेता को दे आते हैं जिसने उन्हें पैसे पकड़ाए हैं. क्योंकि ये भी डर है कि वोट नहीं देने के बाद उसे और उसके परिवार को प्रताड़ित किया जाएगा.

दलित बस्तियों और पिछड़ी जाति के गांवों और इलाके की ग्राउंड रिपोर्ट यही है कि वे आज भी एक रुपए की पारासिटामोल की गोली के लिए तरसते हैं. उनकी औरतें प्रसव पीड़ा से इलाज के अभाव में दम तोड़ देती हैं. शहर के हुए तो उन्हें किसी ठेकेदार के अंडर में कंस्ट्रक्सन का काम मिल जाता है और गांव के हुए तो बनिहारी करके अपना पेट पालते हैं. आजाद देश के आज भी गुलाम बने ये लोग चुनावों में सिर्फ नेताओं को इसलिए नज़र आते हैं कि बिना इनके वोट के सत्ता का स्वाद अधूरा रह सकता है. एक तरह से कहें तो दलित और पिछ़ड़ी जातियां नेताओं को उस कलम की तरह लगती हैं जिनमें दुबारा आप स्याही डाल नहीं सकते. यूज एंड थ्रो का दंश झेल रही इस जाति के लोगों को आज भी इंतजार है वैसे मसीहा कि जो उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से रूबरू करा सके और उन्हें राजनीति के साथ समाजिक पहचान भी दिला सके.

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