बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों?विधान परिषद में मंत्री ने दिए तर्क

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Legislative Council

संवाददाता.पटना.राज्य में लगातार किए जा रहे सुधारात्मक कार्य को नीति आयोग पूरी तरह से दरकिनार कर दिया और ऐसी स्थिति में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के दावे को और बल मिलता है।गुरूवार को विधान परिषद में ऊर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने जदयू नीरज कुमार के एक ध्यानाकर्षण सूचना के जवाब में कहा कि और यह दर्जा मिलने से राज्य को विकास कार्यो के लिए संसाधनों की उपलब्धता आसान हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि नीति आयोग द्वारा बहुआयामी गरीबी सूचकांक में 12 मानक रखे गए हैं। इनमें शिक्षा के दो, स्वास्थ्य के तीन एवं शेष सात सूचकांक जीवन स्तर से जुड़े हुए हैं। इन सूचकांकों का उपयोग विकसित एवं विकासशील राज्यों की गरीबी की माप के लिए एक समान रूप से किया जा रहा है जबकि विकास के विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग राज्यों में विकास सूचकांकों की प्राथमिकता बदलती है। मंत्री ने कहा कि वर्ष 2004-05 में बिहार की 54.4 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी जो वर्ष 2011 में घटकर 33.7 हो गई। महज सात वर्षों की अवधि में राज्य सरकार के प्रयासों से गरीबी दर में 20.7 प्रतिशत की कमी हुई थी। एमपीआई में शिक्षा के दो ही मानक लिए गए हैं।
ऊर्जा मंत्री ने कहा कि राज्य में वर्ष 2005 में दसवीं बोर्ड की परीक्षा में 5.6 लाख परीक्षार्थी शामिल हुए थे, जो वर्ष 2011 में बढ़कर 16.84 लाख हो गए। इसी अवधि में 12वीं बोर्ड की परीक्षा में 3.5 लाख परीक्षार्थियों की संख्या बढ़कर 13.51 लाख हो गई है। बालिका साइकिल योजना, कन्या प्रोत्साहन योजना इत्यादि के प्रभाव से राज्य में बालिकाओं की शिक्षा में नामांकन एवं शैक्षिक उपलब्धियों में एक बड़ा उछाल आया है। वर्ष 2005-06 से अब तक राज्य में 21,264 नए प्राथमिक विद्यालय खोले गए। प्रारंभिक शिक्षा के 2,77,403 वर्ग कक्ष बनाए गए। वर्ष 2006-07 से वर्ष 2016-17 तक 3,49,000 शिक्षकों का नियोजन किया गया।
श्री यादव ने कहा कि राज्य की साक्षरता दर वर्ष 2001 के 47 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2011 में 61.8 प्रतिशत हो गई। शिक्षा के क्षेत्र में अनेक उत्साहजनक प्रगति के आंकड़ों को नीति आयोग के मानकों में स्थान ही नहीं दिया गया है। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में एमपीआई के मात्र तीन सूचकांक लिए गए हैं। बिहार में प्रजनन दर 3.6 (2011) से घटकर 3.0 (2019-20) हो गई। जीवन संभाव्यता जो स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण सूचकांक है में बिहार ने काफी प्रगति की है। वर्ष 2006-10 में जीवन संभाव्यता 65.8 थी, जो वर्ष 2014 -18 में बढ़कर 69.1 हो गई, जो राष्ट्रीय औसत (69.4 वर्ष) के लगभग समान है। इन प्रगति को सूचकांक में शामिल ही नहीं किया गया है।
ऊर्जा मंत्री ने अपने जवाब में कहा कि बहुआयामी गरीबी सूचकांक के तहत जीवन स्तर में बेहतरी के लिए सात सूचकांक शामिल किए गए हैं। वर्ष 2005 में मात्र 700 मेगावाट बिजली की खपत होती थी वहीं वर्ष 2021 में अधिकतम 6627 मेगावाट बिजली की खपत हुई थी। वर्ष 2005 से अब तक पथ निर्माण विभाग की 18992 किलोमीटर सड़क तथा 6047 पुलों का निर्माण किया गया है। वर्ष 2005 में ग्रामीण सड़क की लंबाई 3112 किलोमीटर थी, जो अब बढ़कर 89361 किलोमीटर हो गई है तथा 18686 किलोमीटर पर कार्य जारी है। श्री यादव ने कहा कि सात निश्चय योजना के हर घर नल का जल कार्यक्रम के तहत 192.54 लाख घरों में से 183.53 लाख घरों में नल का जल उपलब्ध करा दिया गया है। हर घर तक पक्की गली नालियां योजना के तहत 1,17,991 वार्डो के विरुद्ध 1,17,464 वार्डो को आच्छादित किया जा चुका है। वर्ष 2014 -15 से 2019 -20 की अवधि में राज्य में प्रति व्यक्ति विकास व्यय में 17.9 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि हुई है जबकि राष्ट्रीय औसत 11.6 प्रतिशत ही है। प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत वर्ष 2012-13 में 145 किलोवाट प्रति घंटा थी जो वर्ष 2019 -20 में 332 किलोवाट प्रति घंटा हो गई। मंत्री ने कहा कि कृषि विकास की दीर्घकालीन योजना पर कार्य किया गया। कृषि रोडमैप की उपलब्धि है कि राज्य में वर्ष 2006-07 में मीट उत्पादन कुल 1.78 लाख मीट्रिक टन था जो वर्ष 2019-20 में 3.83 लाख मीट्रिक टन हो गया। उन्होंने कहा कि राज्य में वर्ष 2006-07 में अंडा का उत्पादन 94 करोड़ रुपए से बढ़कर वर्ष 2019-20 में 274.08 करोड़ रुपए हो गया है। इसी तरह मत्स्य का उत्पादन वर्ष 2005 -06में 2.79 लाख मैट्रिक टन था जो वर्ष 2019-20 में बढ़कर 6.41 लाख मैट्रिक टन हो गया। राज्य में फल के उत्पादन में वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि राज्य में दुग्ध उत्पादन 57.67 लाख मैट्रिक टन से बढ़कर 104.94 लाख मैट्रिक टन हो गया है। राज्य को 5 बार कृषि कर्मण पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
श्री यादव ने कहा कि बिहार की आर्थिक वृद्धि दर वर्ष 2005-06 में 1.69 प्रतिशत ऋणात्मक थी, जो अर्थव्यवस्था की गिरावट का प्रतीक रहा है। वर्ष 2006-07 में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर (स्थिर मूल्य पर) 16.18 प्रतिशत हो गई, जो राष्ट्रीय विकास दर (9.57 प्रतिशत) से काफी अधिक थी। वित्तीय वर्ष 2008 -09 में बिहार की वृद्धि दर 14.54 प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय वृद्धि दर 6.72 प्रतिशत से दोगुना अधिक थी। इस वर्ष आर्थिक वृद्धि दर के आधार पर देश के बड़े राज्यों में बिहार प्रथम स्थान पर था। वर्ष 2010-11 में बिहार की वृद्धि दर एक बार फिर 15.03 प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय वृद्धि दर 8.91 प्रतिशत से काफी अधिक थी और बड़े राज्यों में बिहार दूसरे स्थान पर था। वर्ष 2011-12 में भी बिहार 10.29 प्रतिशत वृद्धि दर के साथ बड़े राज्यों में प्रथम स्थान पर था। बाद के वर्षों में भी राज्य निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार बिहार की वृद्धि दर वर्ष 2016-17 में 8.9 प्रतिशत, वर्ष 2018-19 में 9.3 प्रतिशत तथा वर्ष 2019-20 में 10.5 प्रतिशत रही ,जो राष्ट्रीय वृद्धि दर से अधिक है।

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