आसान नहीं लालू के वोट का सफाया

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प्रमोद दत्त.

राजद सुप्रीमो की सातवीं जेल-यात्रा से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि बिहार की राजनीति से उनकी जड़ें उखड़ जाएगी.एनडीए नेता व समर्थक इसी जोश में बयानबाजी करते नजर आ रहे हैं.लेकिन लालू प्रसाद के राजनीतिक उतार-चढाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह इतना आसान नहीं जैसा प्रचारित किया जा रहा है.

चारा घोटाला में फंसने के बाद और कई जेल यात्राएं कर लेने के बाद भी लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में जमे हुए हैं.इस दौरान कई चुनाव हुए.2010 के विधानसभा चुनाव को छोड़कर कभी उनकी जड़ें हिलती नजर नहीं आई.सत्ता से बेदखल होने के बावजूद राजनीति के एक मजबूत केन्द्र बिंदु बने रहे.

जब भी लालू प्रसाद जेल गए,नुकसान के बजाए इसका राजनीतिक लाभ उठा लिया.1996 में चारा घोटाला उजागर होने के बाद संवैधानिक संकट आने पर मुख्यमंत्री पद छोड़ा.अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया जिसे न सिर्फ पार्टी में स्वीकारा गया बल्कि समर्थकों व उनके मतदाताओं ने भी स्वीकार कर लिया.यह इससे प्रमाणित हो गया जब इसके बाद हुए विधान सभा चुनाव(2000) में लालू की पार्टी राजद 124 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी रही.

सदन में बहुमत साबित करने  में विफल नीतीश कुमार ने जब इस्तीफा दे दिया तो इसके बाद राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद-कांग्रेस की सरकार बनाई गई.तब यह भी स्पष्ट हो गया कि न सिर्फ राजद बल्कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी ने भी लालू के प्रभाव में राबड़ी देवी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया.गौर करने वाली बात यह है कि तब चारा घोटाला में लालू के फंसने के बाद यह पहला चुनाव था.केन्द्र में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी.अर्थात लालू प्रसाद के लिए विकट परिस्थियां थी.

इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में राजद को 40 में 22 सीटों पर जीत मिली.केन्द्र की यूपीए सरकार में लालू प्रसाद की हैसियत बढी और वे रेल मंत्री बनाए गए.2005(फरवरी) के विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला और बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा.लेकिन तब भी 75 सीटें जीतकर राजद सबसे बड़े दल का स्थान बनाए रखा. नवम्बर(2005) में हुए चुनाव में राजद को सत्ता से बाहर होने का झटका तो लगा लेकिन 54 सीटें जीतकर अहसास करा दिया कि उसकी जड़ें उखड़ी नहीं है.अलबत्ता 2010 के विधानसभा चुनाव में राजद की जड़ें जरूर उखड़ी जब जदयू-भाजपा की हवा ने उसे 22 सीटों पर सिमटा दिया.लेकिन इसे लालू-विरोध के बजाए 2005-2010 तक चली नीतीश की सुशासन की सरकार को मिला जनादेश बताया गया.फिर हुआ 2015 का विधान सभा चुनाव.केन्द्र की मोदी-सरकार की चरम पर पहुंची लोकप्रियता के बावजूद महागठबंधन को भारी सफलता मिली. इस जीत में अगर नीतीश कुमार का साफ सुथरा चेहरा सामने था तो उनके पीछे लालू प्रसाद के जनाधार की ताकत थी.

जब भी लालू प्रसाद न्यायिक मामले में फंसे इन्होंने जनता की अदालत पर अधिक भरोसा जताया है.कहने के लिए वे न्यायपालिका के सम्मान की बात करते रहे लेकिन साथ ही जनता की अदालत को सबसे बड़ी अदालत बताकर एक्शन में आते रहे.इसका लाभ भी उन्हें मिलता रहा.शायद इसलिए उनकी सातवीं जेल यात्रा के बाद एक बार फिर न्यायपालिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं.अपने समर्थकों-मतदाताओं को समझाने का यह लालू-फॉर्मूला फिर काम आ जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.राजद के महासचिव व प्रवक्ता चितरंजन गगन कहते भी हैं-कार्यकर्ताओं का जोश दोगुना हुआ है.हमलोग वर्तमान संकट को अवसर में बदलेंगे.

2004 और 2009 में कांग्रेस मजबूत थी जब कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी थी.अभी कांग्रेस कमजोर हुई है.लगातार भाजपा से पिट रही है.गुजरात चुनाव से थोड़ी आशा जगी है.ऐसे समय में बिहार में कांग्रेस कोई जोखिम उठाना नहीं चाहेगी.राजद के साथ तालमेल बना रहेगा.यूपी के समान राहुल-तेजस्वी की जोड़ी घुमेगी तो एनडीए-विरोधी मतों के ध्रुवीकरण की संभावना बढेगी.तब लालू प्रसाद की जड़ें उखाड़ देना आसान नहीं होगा.

 

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सन् 1980 से पत्रकारिता. 1985 से विभिन्न अखबारों एवं पत्रिकाओं में विभिन्न पदों पर कार्यानुभव. बहुचर्चित चारा घोटाला सहित कई घोटाला पर एक्सक्लुसिव रिपोर्ट, चारा घोटाला उजागर करने का विशेष श्रेय. ‘राजनीति गॉसिप’ और ‘दरबारनामा’ कॉलम से विशेष पहचान. ईटीवी बिहार के चर्चित कार्यक्रम ‘सुनो पाटलिपुत्र कैसे बदले बिहार’, साधना न्यूज और हमार टीवी के टीआरपी ओरियेंटेड कार्यक्रम ‘पड़ताल - कितना बदला बिहार’ के रिसर्च हेड और विभिन्न चैनलों के लिए पॉलिटिकल पैनलिस्ट. संपर्क – 09431033460

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